Thursday, March 20, 2014

कमाठीपुरा में

जिस समय गोष्ठियों में 
वे चर्चा कर रहे हैं
अपनी हजारों वर्ष पुरानी
स्वर्णिम संस्कॄति के बारे में
समाज में हमेशा से रहे
स्त्रियों के ऊंचे स्थान के बारे में
उनकी आजादी और सम्मान के बारे में
मैं खड़ा हूं
कमाठीपुरा में।
जहां तंग और गलीज कमरों में
भरी हैं औरतें
सामान असबाब की तरह
जिन्दा गोश्त बेचने के लिये अभिशप्त
कुढती जिन्दगी को कोसती
बीमारियों से ग्रस्त।
इन्ही कोठरियों में
नौ दस साल की 
छोटी छोटी अबोध बच्चियां भी हैं
बदबू सीलन और घने गाढॆ अन्धेरे में
हजारों वर्ष की प्राचीन सभ्यता के नीचे
कुचला हुआ उनका बचपन है
इनके लिये कोई खेल का मैदान नहीं
गीत नहीं खिलौने नहीं
सिर्फ़ बिस्तर हैं
कमाठीपुरा में खड़ा हूं मैं
जहां खड़ी हैं सजी धजी औरतें
नुमायश में लगी चीजों की तरह
खड़ी हैं बेतरतीब टैक्सियां
पुलिसवाले और भडुवे
शरीर संस्कॄति की फ़सल
काट रही हैं यहां की औरतें
फ़सल जिसको बोया था
कभी हमने ही
हम ही डकार रहे हैं फायदा भी
उस व्यवस्था में फंस कर 
तडप रही हैं यहां की औरतें
जिसका जाल हमने ही बुना था
कमाठीपुरा की संकरी गलियों
और अन्धेरी कोठरियों में
कैद है एक समूची दुनिया
जहरीली भूख और छुद्र वासनाऒं
के दंश से नीली
घुलती सड़ती सांस लेती
मारती हैं झन्नाटेदार तमाचा
हमारे चेहरे पर
गर महसूस कर सकें हम।
कमाठीपुरा में खडा हूं मैं
अपने आप पर लज्जित,,,,,,,,,,,,,,,,,

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