Wednesday, March 19, 2014

सिर्फ एक देह

सिर्फ़ एक देह : दो कविताए

एक-

वो हर जगह मौजूद है
तुम सोच भी नहीं सकती
कि वो तुम्हारी सोच में है
वो कहां नही है
वो धर्मग्रन्थों और पवित्र पुस्तकों में है
वो तुम्हारे श्रंगार के सामान
तुम्हारे कपड़ो में है
तुम्हारे माथे की बिन्दी में 
उनकी जिद चमकती है
तुम्हारी चूड़ियों की खनखनाहट में 
उनकी हठीली हंसी बजती है
यहां तक कि जब तुम बोलती हो
तब तुम्हारे गले में
उनकी आवाज होती है
जब तुम हंसती हो
तो यह तुम्हारी हंसी नहीं
उनकी हंसी होती है
बहुत बचपन से ही 
वे घोल देते हैं 
तुम्हारे अन्दर 
कुछ ऐसे रसायन 
अपनी कुटिल सीख के
जिसके विष के प्रभाव में
तुम रहती हो भरम में
विस्मॄति रहती हो कि
पेडों, चिडियों और बादलों के साथ दॄश्य में
तुम क्या हो और क्यों हो।
ये जो तुम जीवित हो
तुम्हें तो उन्होंने 
कब का खत्म कर दिया
अब तो तुम 
सिर्फ एक देह हो।।

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