दो-
वे बहुरूपिया हैं
वे मर्द होने का अपना अपना
दम्भी अभिनय बाखूबी निभाते हैं
तुमसे तुम्हारे सपने / तुम्हारा भविष्य छीन लेना
वे गजब की सफ़ाई के साथ कर जाते हैं
अपनी और सिर्फ़ अपनी
इच्छाऒं की डोर पे
नचाते हुए वे
निचोड लेते हैं
तुम्हारे अन्द्रर से धीरे धीरे
तुम्हारी सोच और इच्छाऒं का द्रव
रहने देते हैं तुम्हें बस
एक भरी पूरी देह
वे रचाते हैं तुमसे प्यार का ढॊंग
कुटिल मुस्कानों के साथ
स्वपनिल सी मीठी - मीठी बातें करते हैं
बहुत धूर्तता और चालाकी से
खोदते हैं प्रशन्सा के कुएं गहरे
और तुम्हें ढकेल् आते हैं।
बेखबर तुम जिन्दा रहती हो
जैसे नींद में चलती हो
खुश रहती हो
कि अहा जीवन में प्यार है
प्रेम पत्र है
फूल हैं इत्र की शीशियां हैं
चाकलेट हैं रत्न की अंगूठियां हैं
तुम्हें भनक भी नहीं लगती
कि ये हथियार हैं उनके
जो तुम्हें नहीं सुनने देते हैं
झूठी खुशियों के खोखले अन्धेरे से
तिरती तुम्हारी खुद की सिसकियों की आवाज
वे हर लेते हैं तुम्हारी आत्मा
तुम्हारे मन को
छल प्रपंच और कपट से
और फ़िर बडे जतन से
समेट देते हैं तुम्हें
जाघों, स्तन, नितम्ब और चेहरे में
वे बेहया खीसें निपोरते
समय असमय तुम्हें रॊंदते
रोप देते हैं तुम्हारी कोख में
चाहे अनचाहे बच्चे
अपने मर्द होने के दम्भ में
तुम नही बता सकती हो
कि कब जोंक की तरह
चूस लिया है उन्होंने
तुम्हारे सपने देखने की शक्ति को
दीमक की तरह कब चाट गये हैं वे
तुम्हारी चेतना की उजली परत को
सचमुच तुम्हें पता ही नहीं चलता
कि तुम रह गई हो
सिर्फ़ एक देह
पुरुषों की धुन पर नाचती
और खुश होती
हमबिस्तर होती
बच्चे जनती
सिर्फ़ एक देह,,,,,,,,,,,,,,,,,,
वे बहुरूपिया हैं
वे मर्द होने का अपना अपना
दम्भी अभिनय बाखूबी निभाते हैं
तुमसे तुम्हारे सपने / तुम्हारा भविष्य छीन लेना
वे गजब की सफ़ाई के साथ कर जाते हैं
अपनी और सिर्फ़ अपनी
इच्छाऒं की डोर पे
नचाते हुए वे
निचोड लेते हैं
तुम्हारे अन्द्रर से धीरे धीरे
तुम्हारी सोच और इच्छाऒं का द्रव
रहने देते हैं तुम्हें बस
एक भरी पूरी देह
वे रचाते हैं तुमसे प्यार का ढॊंग
कुटिल मुस्कानों के साथ
स्वपनिल सी मीठी - मीठी बातें करते हैं
बहुत धूर्तता और चालाकी से
खोदते हैं प्रशन्सा के कुएं गहरे
और तुम्हें ढकेल् आते हैं।
बेखबर तुम जिन्दा रहती हो
जैसे नींद में चलती हो
खुश रहती हो
कि अहा जीवन में प्यार है
प्रेम पत्र है
फूल हैं इत्र की शीशियां हैं
चाकलेट हैं रत्न की अंगूठियां हैं
तुम्हें भनक भी नहीं लगती
कि ये हथियार हैं उनके
जो तुम्हें नहीं सुनने देते हैं
झूठी खुशियों के खोखले अन्धेरे से
तिरती तुम्हारी खुद की सिसकियों की आवाज
वे हर लेते हैं तुम्हारी आत्मा
तुम्हारे मन को
छल प्रपंच और कपट से
और फ़िर बडे जतन से
समेट देते हैं तुम्हें
जाघों, स्तन, नितम्ब और चेहरे में
वे बेहया खीसें निपोरते
समय असमय तुम्हें रॊंदते
रोप देते हैं तुम्हारी कोख में
चाहे अनचाहे बच्चे
अपने मर्द होने के दम्भ में
तुम नही बता सकती हो
कि कब जोंक की तरह
चूस लिया है उन्होंने
तुम्हारे सपने देखने की शक्ति को
दीमक की तरह कब चाट गये हैं वे
तुम्हारी चेतना की उजली परत को
सचमुच तुम्हें पता ही नहीं चलता
कि तुम रह गई हो
सिर्फ़ एक देह
पुरुषों की धुन पर नाचती
और खुश होती
हमबिस्तर होती
बच्चे जनती
सिर्फ़ एक देह,,,,,,,,,,,,,,,,,,
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